CG PET 2025 PHYSICS SOLUTION
(a) तापीय ऊर्जा चालन बैंड में अधिक इलेक्ट्रॉनों को उत्तेजित करती है।
(b) अर्धचालक का प्रतिरोध कम हो जाता है।
(c) अर्धचालक का तापमान बढ़ जाता है।
(d) विद्युत संचालन के लिए अधिक आवेश वाहक उपलब्ध हो जाते हैं।
A. a > d > b > c
B. a > b > c > d
C. d > b > a > c
D. c > a > d > b
विस्तृत समाधान:
- (c) सबसे पहले तापमान में वृद्धि होती है।
- (a) ऊर्जा पाकर इलेक्ट्रॉन 'चालन बैंड' में जाते हैं।
- (d) इससे 'आवेश वाहक' (Charge carriers) बढ़ते हैं।
- (b) अंत में, प्रतिरोध (Resistance) कम हो जाता है।
CG PET 2025 PHYSICS SOLUTION
विस्तृत समाधान (Explanation):
यह प्रश्न प्वाइजुली के नियम (Poiseuille's Law) पर आधारित है।
नियम के अनुसार, एक क्षैतिज केशनली से प्रवाहित होने वाले द्रव का आयतन ($V$) प्रति सेकंड (प्रवाह की दर) निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है:
- नली के सिरों के बीच दाब अंतर ($P$) के समानुपाती।
- नली की त्रिज्या ($r$) की चौथी घात ($r^4$) के समानुपाती।
- द्रव की श्यानता गुणांक ($\eta$) के व्युत्क्रमानुपाती।
- नली की लंबाई ($L$) के व्युत्क्रमानुपाती।
सूत्र: $$Q = \frac{\pi P r^4}{8 \eta L}$$
CG PET 2025 PHYSICS SOLUTION
अभिकथन [As]: प्रतिचुंबकीय पदार्थ (Diamagnetic substance) चुंबकीय क्षेत्र द्वारा आकर्षित नहीं होते हैं।
कारण [R]: प्रतिचुंबकीय पदार्थों में कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन (unpaired electrons) नहीं होते हैं।
तार्किक व्याख्या (Solution):
1. अभिकथन [As] की जाँच: प्रतिचुंबकीय पदार्थ (Diamagnetic materials) बाहरी चुंबकीय क्षेत्र से प्रतिकर्षित (Repel) होते हैं, आकर्षित नहीं। इसलिए यह कथन सही है कि वे आकर्षित नहीं होते।
2. कारण [R] की जाँच: प्रतिचुंबकीय पदार्थों के सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित (Paired) होते हैं। युग्मित होने के कारण इनका कुल चुंबकीय आघूर्ण (Net Magnetic Moment) शून्य होता है।
(J) घनत्व (Density)
(K) विकृति (Strain)
(L) कोण (Angle)
(M) कोणीय वेग (Angular velocity)
विस्तृत विश्लेषण:
- (K) विकृति (Strain): यह लंबाई में परिवर्तन और प्रारंभिक लंबाई का अनुपात है ($\frac{\Delta L}{L}$)। समान राशियों का अनुपात होने के कारण इसकी कोई विमा नहीं होती ($M^0 L^0 T^0$)।
- (L) कोण (Angle): कोण = चाप / त्रिज्या ($\frac{Arc}{Radius}$)। चूँकि चाप और त्रिज्या दोनों की विमा लंबाई ($L$) है, इसलिए कोण भी एक विमाहीन राशि है।
- (J) घनत्व: इसकी विमा $[ML^{-3}]$ होती है।
- (M) कोणीय वेग: इसकी विमा $[T^{-1}]$ होती है।
| कालम - I | कालम - II |
|---|---|
| (a) समतापी (Isothermal) | (I) गैस द्वारा किया कार्य आंतरिक ऊर्जा घटाता है |
| (b) रुद्धोष्म (Adiabatic) | (II) आंतरिक ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं |
| (c) समआयतनिक (Isochoric) | (IV) गैस पर या गैस द्वारा कोई कार्य नहीं होता |
| (d) समदाबिय (Isobaric) | (III) अवशोषित ताप का कुछ भाग आंतरिक ऊर्जा बढ़ाता है और कुछ भाग कार्य में |
विस्तृत समाधान:
- Isothermal ($\Delta T=0$): तापमान नहीं बदलता, इसलिए आंतरिक ऊर्जा स्थिर रहती है। (a → II)
- Adiabatic ($Q=0$): बाहरी ऊष्मा नहीं मिलती, इसलिए किया गया कार्य सीधे आंतरिक ऊर्जा को कम करता है। (b → I)
- Isochoric ($\Delta V=0$): आयतन स्थिर है, तो कार्य $W = P\Delta V$ शून्य होगा। (c → IV)
- Isobaric: ऊष्मा का उपयोग आंतरिक ऊर्जा बढ़ाने और कार्य करने दोनों में होता है। (d → III)
(b) चुंबक को बाहरी समरूप चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है।
(c) चुंबकीय क्षेत्र के कारण चुंबक पर घूर्णन बल (Torque) कार्य करता है।
(d) चुंबक स्वयं को क्षेत्र के साथ संरेखित करता है या दोलन करता है।
(e) समानांतर होने पर स्थितिज ऊर्जा न्यूनतम होती है।
ऑफिशियल आंसर की (A) के अनुसार तर्क:
- (a): सबसे पहले चुंबक का अपना चुंबकीय क्षेत्र (रेखाएं) होना अनिवार्य है।
- (d): इसके बाद वह पृथ्वी या बाहरी क्षेत्र के प्रभाव में संरेखण (Alignment) की प्रवृत्ति दिखाता है।
- (b): फिर उसे विशिष्ट रूप से किसी प्रायोगिक 'समरूप चुंबकीय क्षेत्र' में रखा जाता है।
- (c): उस क्षेत्र में रखने के बाद टॉर्क प्रभावी रूप से काम करता है।
- (e): और अंत में वह न्यूनतम ऊर्जा की स्थिति प्राप्त करता है।
| स्तम्भ - I | स्तम्भ - II |
|---|---|
| (a) प्रक्रिया J - K | (s) Q < 0 |
| (b) प्रक्रिया K - L | (p) Q > 0, (r) W > 0 |
| (c) प्रक्रिया L - M | (p) Q > 0 |
| (d) प्रक्रिया M - J | (q) W < 0, (s) Q < 0 |
ऑफिशियल तर्क (Explanation):
- J → K: आयतन स्थिर है, दाब गिर रहा है → तापमान घटा → ऊष्मा बाहर निकली (Q < 0)।
- K → L: आयतन बढ़ा → कार्य धनात्मक (W > 0) और ऊष्मा अवशोषित हुई (Q > 0)।
- L → M: आयतन स्थिर, दाब बढ़ा → तापमान बढ़ा → ऊष्मा ली गई (Q > 0)।
- M → J: इस प्रक्रिया में संपीड़न (Compression) हो रहा है, जिससे आयतन घट रहा है → कार्य ऋणात्मक (W < 0) और ऊष्मा बाहर निकल रही है (Q < 0)।
विस्तृत समाधान:
सूत्र (Formula): $$U = -\frac{GMm}{r}$$
- गुरुत्वाकर्षण बल एक आकर्षण बल है।
- अनंत (Infinity) पर स्थितिज ऊर्जा को शून्य माना जाता है।
- जैसे-जैसे दो पिंड एक-दूसरे के करीब आते हैं, ऊर्जा घटती जाती है, इसलिए यह हमेशा ऋणात्मक (Negative) बनी रहती है।
विस्तृत समाधान:
प्रत्यास्थता गुणांकों (Elastic Moduli) के बीच का मानक संबंध है:
इसे हल करने पर हमे प्राप्त होता है:
दिए गए सूत्र से तुलना करने पर:
- यहाँ $Y$ = यंग मापांक (Young's Modulus)
- $K$ = आयतन प्रत्यास्थता गुणांक (Bulk Modulus)
- $\eta$ = दृढ़ता गुणांक (Modulus of Rigidity)
- अतः, $a$ का मान 3 है।
(b) उच्च तापमान पर इलेक्ट्रॉन अधिक स्वतंत्र रूप से गति करते हैं।
(c) धातु का प्रतिरोध बढ़ जाता है।
(d) धातु में परमाणु कंपन तीव्र हो जाते हैं।
तार्किक क्रम (Logical Sequence):
- स्टेप (a): सबसे पहले बाह्य कारणों से धातु का तापमान बढ़ता है।
- स्टेप (d): तापमान बढ़ने से धातु के भीतर स्थित परमाणुओं का तापीय कंपन (Atomic Vibrations) तेज हो जाता है।
- स्टेप (b): इन कंपनों के कारण इलेक्ट्रॉनों के मार्ग में बाधा आती है, जिससे वे अधिक टकराते हैं (यहाँ 'स्वतंत्र रूप से गति' का अर्थ उनके थर्मल मोशन के बढ़ने से है जो बाधा उत्पन्न करता है)।
- स्टेप (c): अंत में, इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह में आने वाली इस बाधा के कारण धातु का प्रतिरोध (Resistance) बढ़ जाता है।
विस्तृत समाधान:
सरल आवर्त गति (SHM) में ऊर्जा वितरण:
- माध्य स्थिति (Mean Position, x = 0): यहाँ वेग अधिकतम होता है, इसलिए गतिज ऊर्जा (K.E.) अधिकतम होती है और स्थितिज ऊर्जा (P.E.) शून्य होती है।
- अधिकतम विस्थापन/आयाम (Extreme Position, x = ±a): यहाँ कण क्षण भर के लिए रुकता है (वेग = 0), इसलिए गतिज ऊर्जा शून्य हो जाती है और पूरी ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा (P.E.) में बदल जाती है।
विस्तृत समाधान:
स्टेप-बाय-स्टेप गणना:
- विद्युत धारा (Current, $I$): एक वृत्ताकार पथ में घूमते आवेश के कारण उत्पन्न धारा होती है: $$I = \frac{q}{T} = \frac{q v}{2\pi R}$$
- क्षेत्रफल (Area, $A$): वृत्ताकार पथ का क्षेत्रफल होता है: $$A = \pi R^2$$
- चुंबकीय आघूर्ण (Magnetic Moment, $M$): सूत्र $M = I \times A$ का उपयोग करने पर: $$M = \left( \frac{q v}{2\pi R} \right) \times (\pi R^2)$$
(b) यह ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुरूप है।
(c) यह प्रेरित विद्युत वाहक बल का परिमाण (Magnitude) निर्धारित करता है।
(d) प्रेरित धारा उस दिशा में प्रवाहित होती है जो संतुलन बनाए रखती है।
विस्तृत विश्लेषण:
- कथन (a): लेंज़ का नियम स्पष्ट रूप से कहता है कि प्रेरित धारा की दिशा ऐसी होती है कि वह उस **कारण (फ्लक्स परिवर्तन) का विरोध** करती है जिसने उसे पैदा किया है।
- कथन (b): यह नियम **ऊर्जा संरक्षण (Conservation of Energy)** पर आधारित है। यदि विरोध नहीं होता, तो बिना कार्य किए ऊर्जा उत्पन्न होने लगती, जो असंभव है।
- कथन (c) गलत है: लेंज़ का नियम केवल **दिशा (Direction)** बताता है। परिमाण (Magnitude) फैराडे के नियम से निकाला जाता है।
(b) फ्लक्स की परिभाषा का उपयोग करके गाउसी सतह के माध्यम से विद्युत प्रवाह की गणना करें।
(c) उस आवेश वितरण की पहचान करें जो विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है।
(d) कुल प्रवाह को संलग्न आवेश से जोड़ने के लिए गॉस नियम का उपयोग करें।
(e) विद्युत क्षेत्र $\vec{E}$ के परिमाण एवं दिशा के लिए हल करें।
गॉस नियम लागू करने का सही क्रम:
- Step 1 (c): सबसे पहले **आवेश वितरण** को पहचानना जरूरी है ताकि हम उसकी सममिति (Symmetry) समझ सकें।
- Step 2 (a): सममिति के आधार पर एक उपयुक्त **गाउसी सतह** का चुनाव करें और उसके अंदर का कुल आवेश ($q_{in}$) निकालें।
- Step 3 (b): सतह से गुजरने वाले **विद्युत फ्लक्स** ($\oint \vec{E} \cdot d\vec{A}$) की गणना करें।
- Step 4 (d): अब **गॉस के नियम** ($\phi = q/\epsilon_0$) का उपयोग करके फ्लक्स और आवेश को जोड़ें।
- Step 5 (e): अंत में, समीकरण को **विद्युत क्षेत्र $\vec{E}$** के लिए हल करें।
कारण [R]: संधारित्र विद्युत क्षेत्र में ऊर्जा संचित करके वोल्टेज में परिवर्तन का विरोध करता है।
विस्तृत समाधान:
- अभिकथन [As]: शुद्ध संधारित्र (Pure Capacitor) परिपथ में धारा ($I$), वोल्टेज ($V$) से हमेशा $90^\circ$ (या $\pi/2$ रेडियन) **आगे (Lead)** होती है। यह कथन बिल्कुल सत्य है।
- कारण [R]: संधारित्र अपनी प्लेटों के बीच **विद्युत क्षेत्र (Electric Field)** के रूप में ऊर्जा जमा करता है। यही गुण वोल्टेज में अचानक होने वाले बदलावों का विरोध करता है, जिसके कारण धारा और वोल्टेज के बीच फेज अंतर (Phase Difference) पैदा होता है।
(b) वृत्ताकार पटल (Plate) के व्यास के परितः
(c) वृत्ताकार वलय के लंबवत तल की स्पर्शरेखा के परितः
(d) वृत्ताकार पटल के तल की स्पर्शरेखा के परितः
ऑफिशियल तर्क (Calculation):
| निकाय और अक्ष | k का मान |
|---|---|
| (c) वलय की स्पर्शरेखा (लंबवत) | 1.41 R |
| (d) पटल की स्पर्शरेखा (तल में) | 1.12 R |
| (a) वलय का व्यास | 0.71 R |
| (b) पटल का व्यास | 0.50 R |
अतः घटता क्रम है: c (1.41) > d (1.12) > a (0.71) > b (0.50)
| कालम - I | कालम - II |
|---|---|
| (a) प्रोटॉन (Proton) | (I) $0.6931 / \lambda$ |
| (b) न्यूट्रॉन (Neutron) | (II) जेम्स चैडविक |
| (c) रेडियोधर्मी क्षय नियम | (III) रदरफोर्ड |
| (d) अर्धआयु (Half-life) | (IV) $-dN/dt = \lambda N$ |
विस्तृत समाधान:
- (a) प्रोटॉन: इसकी खोज का श्रेय मुख्य रूप से रदरफोर्ड (Rutherford) को दिया जाता है। (a → III)
- (b) न्यूट्रॉन: इसकी खोज 1932 में जेम्स चैडविक (James Chadwick) ने की थी। (b → II)
- (c) रेडियोधर्मी क्षय नियम: यह नियम बताता है कि क्षय की दर परमाणुओं की संख्या के समानुपाती होती है: $-\frac{dN}{dt} = \lambda N$। (c → IV)
- (d) अर्धआयु: किसी रेडियोधर्मी पदार्थ की आधी मात्रा क्षय होने में लगा समय $T_{1/2} = \frac{\ln 2}{\lambda} \approx \frac{0.693}{\lambda}$ होता है। (d → I)
(b) झिरी (Slit) सुसंगत प्रकाश स्रोत (Coherent sources) के रूप में कार्य करती है।
(c) स्क्रीन पर विभिन्न बिंदुओं पर रचनात्मक (Constructive) और विनाशात्मक (Destructive) व्यतिकरण होता है।
(d) स्क्रीन पर उज्ज्वल (Bright) और अंधकारमय (Dark) धारियों का पैटर्न देखा जाता है।
(e) प्रकाश दो समीपस्थ झिरियों (Slits) से होकर गुजरता है।
व्यतिकरण की प्रक्रिया का सही क्रम:
- Step 1 (e): सबसे पहले प्रकाश का पुंज दो संकीर्ण झिरियों से होकर **गुजरता है**।
- Step 2 (b): हाइजेंस के सिद्धांत के अनुसार, ये झिरियाँ **सुसंगत प्रकाश स्रोत** की तरह व्यवहार करने लगती हैं।
- Step 3 (a): जब तरंगें स्क्रीन की ओर बढ़ती हैं, तो अलग दूरी तय करने के कारण उनमें **पथ अंतर** और फलस्वरूप **चरण अंतर** पैदा होता है।
- Step 4 (c): स्क्रीन के अलग-अलग बिंदुओं पर ये तरंगें आपस में मिलती हैं, जिससे **रचनात्मक और विनाशात्मक व्यतिकरण** होता है।
- Step 5 (d): अंत में, हमें स्क्रीन पर **चमकीली और काली फ्रिंजें** (Fringes) दिखाई देती हैं।
(b) प्रेरित वि. वा. बल, चुंबकीय प्रवाह के परिवर्तन की दर के समानुपाती होता है।
(c) एक स्थिर चुंबकीय क्षेत्र एक प्रेरित वि. वा. बल उत्पन्न करता है।
(d) प्रेरित धारा की दिशा लेंज के नियम द्वारा दी जाती है।
विस्तृत विश्लेषण:
- कथन (a) सत्य है: फैराडे के प्रथम नियम के अनुसार, जब भी किसी सर्किट से जुड़े चुंबकीय फ्लक्स में **परिवर्तन** होता है, तो EMF प्रेरित होता है।
- कथन (b) सत्य है: द्वितीय नियम के अनुसार, प्रेरित EMF का परिमाण फ्लक्स परिवर्तन की दर के समानुपाती होता है ($e = -d\Phi/dt$)।
- कथन (c) गलत है: एक **स्थिर** (Constant) चुंबकीय क्षेत्र कभी भी EMF पैदा नहीं कर सकता; इसके लिए फ्लक्स का बदलना अनिवार्य है।
- कथन (d) सत्य है: प्रेरित धारा की **दिशा** हमेशा लेंज के नियम (Lenz's Law) से ज्ञात की जाती है।
विस्तृत विश्लेषण (Logical Breakdown):
आवर्धन $m = +2$ के दो मुख्य संकेत हैं:
- धनात्मक चिन्ह (+): इसका मतलब है कि प्रतिबिम्ब आभासी (Virtual) और सीधा (Erect) है।
- मान (2): चूँकि मान 1 से बड़ा है ($|m| > 1$), इसका मतलब है कि प्रतिबिम्ब वस्तु से बड़ा (Enlarged) है।
विस्तृत विश्लेषण:
- अदिश राशियाँ (A, B, C): द्रव्यमान, चाल और समय को व्यक्त करने के लिए केवल **परिमाण (Magnitude)** की आवश्यकता होती है, दिशा की नहीं।
- सदिश राशि (D): संवेग (Momentum) एक सदिश राशि है क्योंकि इसे व्यक्त करने के लिए परिमाण और **दिशा (Direction)** दोनों की आवश्यकता होती है।
(यहाँ $\vec{p}$ संवेग है और $\vec{v}$ वेग, जो कि खुद एक सदिश है।)
महत्वपूर्ण वैचारिक स्पष्टीकरण:
गॉस के नियम में दो अलग-अलग राशियाँ हैं:
- विद्युत क्षेत्र ($\vec{E}$): सतह के किसी भी बिंदु पर विद्युत क्षेत्र **सभी मौजूद आवेशों** ($q_1$ और $q_2$ दोनों) के कारण होता है। बाहरी आवेश $q_2$ भी सतह पर अपना विद्युत क्षेत्र पैदा करता है।
- कुल फ्लक्स ($\phi$): गॉस के नियम के अनुसार, पूरी सतह से गुजरने वाला **नेट फ्लक्स** केवल **भीतरी आवेश ($q_1$)** पर निर्भर करता है। बाहरी आवेश $q_2$ का नेट फ्लक्स शून्य होता है क्योंकि जितनी रेखाएं अंदर आती हैं, उतनी ही बाहर निकल जाती हैं।
| कालम - I | कालम - II |
|---|---|
| (a) स्रोत व श्रोता के बीच सापेक्ष गति के कारण आवृत्ति में परिवर्तन | (I) बिट्स (Beats) |
| (b) ध्वनि की तीव्रता समय के साथ बदलती रहती है | (II) अनुप्रस्थ तरंग (Transverse wave) |
| (c) हवा में ध्वनि तरंगें | (III) डॉपलर शिफ्ट (Doppler effect) |
| (d) प्रकाश तरंगें हैं | (IV) अनुदैर्ध्य तरंग (Longitudinal wave) |
विस्तृत समाधान:
- (a) डॉपलर प्रभाव (Doppler Effect): जब स्रोत या श्रोता के बीच सापेक्ष गति होती है, तो आभासी आवृत्ति बदल जाती है। (a → III)
- (b) विस्पंद (Beats): जब लगभग समान आवृत्ति की दो तरंगें मिलती हैं, तो ध्वनि की तीव्रता समय के साथ घटती-बढ़ती है। (b → I)
- (c) हवा में ध्वनि: हवा में ध्वनि तरंगें माध्यम के कणों के संपीड़न और विरलन (Compression & Rarefaction) के रूप में चलती हैं, इसलिए ये अनुदैर्ध्य होती हैं। (c → IV)
- (d) प्रकाश तरंगें: प्रकाश विद्युत-चुंबकीय तरंग है जिसमें दोलन प्रसार की दिशा के लंबवत होते हैं, अतः ये अनुप्रस्थ होती हैं। (d → II)
कारण [R]: किसी पिंड पर कार्य करने वाला बल उसके द्रव्यमान और वेग के गुणनफल के बराबर होता है।
विस्तृत विश्लेषण (Logical Breakdown):
- अभिकथन [As]: यह न्यूटन के गति के द्वितीय नियम का सीधा कथन है। संवेग परिवर्तन की दर ($dp/dt$) वास्तव में आरोपित बल ($F$) के समानुपाती होती है ($F = dp/dt$)। अतः यह सत्य है।
- कारण [R]: यहाँ एक तकनीकी गलती है। द्रव्यमान ($m$) और वेग ($v$) का गुणनफल संवेग (Momentum, $p$) कहलाता है, बल नहीं। बल तो द्रव्यमान और त्वरण ($a$) का गुणनफल होता है ($F = ma$)। अतः यह असत्य है।
कारण [R]: संपीड़न या खिंचाव में स्प्रिंग (या कमानी) पर प्रत्यानयन बल (Restoring force) के विरुद्ध कार्य किया जाता है।
विस्तृत विश्लेषण (Logical Breakdown):
- अभिकथन [As]: जब भी हम किसी स्प्रिंग को दबाते या खींचते हैं, तो उसकी आकृति बदल जाती है। इस अवस्था में उसमें ऊर्जा जमा हो जाती है जिसे प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा (Elastic Potential Energy) कहते हैं। अतः यह कथन सत्य है।
- कारण [R]: स्प्रिंग को उसकी मूल स्थिति से हटाने पर उसमें एक प्रत्यानयन बल (Restoring Force, $F = -kx$) उत्पन्न होता है। उसे दबाने या खींचने के लिए हमें इस बल के विरुद्ध बाहरी कार्य करना पड़ता है, और यही किया गया कार्य स्थितिज ऊर्जा ($U = \frac{1}{2}kx^2$) के रूप में संचित होता है। अतः यह भी सत्य है।
विस्तृत समाधान (Work-Energy Theorem):
कार्य-ऊर्जा प्रमेय के अनुसार:
- चूँकि प्रारंभिक गति ($u$) और अंतिम गति ($v$) समान है ($v = u$)।
- इसलिए, प्रारंभिक गतिज ऊर्जा और अंतिम गतिज ऊर्जा भी बराबर होगी: $$\frac{1}{2}mu^2 = \frac{1}{2}mv^2$$
- अतः गतिज ऊर्जा में परिवर्तन ($\Delta K.E.$) शून्य होगा।
विस्तृत समाधान (Mathematical Proof):
संवेग ($p$) और गतिज ऊर्जा ($K$) के बीच का संबंध है:
- प्रश्न के अनुसार, गतिज ऊर्जा ($K$) दोनों वस्तुओं के लिए समान (Constant) है।
- अतः संवेग सीधे द्रव्यमान के वर्गमूल के समानुपाती होगा: $$p \propto \sqrt{m}$$
- इसका अर्थ है कि जिस वस्तु का द्रव्यमान ($m$) अधिक होगा, उसका संवेग ($p$) भी अधिक होगा।
कारण [R]: अधिकतम ऊंचाई पर गेंद पर कार्य करने वाला एकमात्र बल गुरुत्वाकर्षण है।
विस्तृत विश्लेषण (Conceptual Breakdown):
- अभिकथन [As] गलत है: अधिकतम ऊंचाई पर गेंद का वेग ($v$) तो क्षण भर के लिए शून्य होता है, लेकिन त्वरण ($g$) कभी शून्य नहीं होता। पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण ($9.8 \text{ m/s}^2$) हमेशा नीचे की ओर कार्य करता रहता है। यदि त्वरण शून्य हो जाता, तो गेंद ऊपर ही रुकी रह जाती और नीचे कभी नहीं आती।
- कारण [R] सत्य है: जब गेंद हवा में होती है (हवा के प्रतिरोध को नगण्य मानते हुए), तो उस पर केवल **गुरुत्वाकर्षण बल ($F = mg$)** ही कार्य करता है, जो उसे नीचे की ओर खींचता है।
कारण [R]: शुद्ध प्रेरकीय परिपथ में वोल्टेज और धारा समान कला (Phase) में होते हैं।
विस्तृत वैचारिक विश्लेषण:
- अभिकथन [As] सत्य है: एक शुद्ध प्रेरक (Pure Inductor) में, चक्र के आधे भाग में ऊर्जा चुंबकीय क्षेत्र के रूप में संचित होती है और अगले आधे भाग में वह वापस स्रोत को लौटा दी जाती है। इसलिए, पूरे चक्र के लिए औसत शक्ति ($P_{avg}$) शून्य होती है।
- कारण [R] असत्य है: शुद्ध प्रेरकीय परिपथ में वोल्टेज और धारा समान कला में नहीं होते। वास्तव में, वोल्टेज धारा से 90° आगे होता है (या धारा 90° पीछे होती है)।
$$P_{avg} = V_{rms} I_{rms} \cos \phi$$
यहाँ $\phi = 90^\circ$, और $\cos 90^\circ = 0$, इसलिए $P_{avg} = 0$。
विस्तृत समाधान (Mathematical Solution):
1. अप्रगामी तरंग का बनना:
जब विपरीत दिशा में चलने वाली दो समान तरंगें मिलती हैं, तो वे एक अप्रगामी तरंग बनाती हैं। इनका परिणामी विस्थापन होगा:
2. नोड्स (Nodes) की स्थिति:
- नोड्स वे बिंदु होते हैं जहाँ आयाम शून्य होता है, यानी $\sin(kx) = 0$।
- यह तब होता है जब $kx = n\pi$ (जहाँ $n = 0, 1, 2, ...$)।
3. दो नोड्स के बीच की दूरी:
TIR के लिए आवश्यक शर्तें:
- पहली शर्त: प्रकाश की किरण को हमेशा सघन (Denser) माध्यम से विरल (Rarer) माध्यम की ओर जाना चाहिए (जैसे पानी से हवा में)।
- दूसरी शर्त: आपतन कोण (Angle of Incidence) का मान उस माध्यम के क्रांतिक कोण (Critical Angle) से अधिक होना चाहिए।
B - किरचॉफ का लूप नियम (Loop Law) ऊर्जा संरक्षण नियम से प्राप्त होता है।
विस्तृत विश्लेषण (Physics Concepts):
- कथन A (संधि नियम): इसे किरचॉफ का प्रथम नियम भी कहते हैं। यह कहता है कि किसी जंक्शन पर आने वाली धाराओं का योग जाने वाली धाराओं के योग के बराबर होता है। चूंकि धारा आवेश के प्रवाह की दर है, इसलिए यह **आवेश संरक्षण (Conservation of Charge)** को दर्शाता है।
- कथन B (लूप नियम): इसे किरचॉफ का द्वितीय नियम कहते हैं। यह कहता है कि किसी बंद लूप के चारों ओर विभव परिवर्तनों का बीजगणितीय योग शून्य होता है। चूंकि विभव प्रति इकाई आवेश की ऊर्जा है, इसलिए यह **ऊर्जा संरक्षण (Conservation of Energy)** पर आधारित है।
चरण-दर-चरण समाधान:
-
Step 1: समानांतर प्रतिरोध निकालें ($R_p$):
$6\,\Omega$ और $12\,\Omega$ समानांतर में हैं: $$R_p = \frac{6 \times 12}{6 + 12} = \frac{72}{18} = 4\,\Omega$$ -
Step 2: कुल प्रतिरोध ($R_{total}$):
यह $4\,\Omega$ का समूह बाहरी $6\,\Omega$ के साथ श्रेणीक्रम में है: $$R_{total} = 4\,\Omega + 6\,\Omega = 10\,\Omega$$ -
Step 3: परिपथ की कुल धारा ($I$):
$$I = \frac{V}{R_{total}} = \frac{10\text{ V}}{10\,\Omega} = 1\text{ A}$$ -
Step 4: $12\,\Omega$ के सिरों पर विभवांतर:
समानांतर समूह ($R_p$) के सिरों पर वोल्टेज ही $12\,\Omega$ के सिरों पर होगा: $$V_p = I \times R_p = 1\text{ A} \times 4\,\Omega = 4\text{ V}$$
कारण [R]: घूर्णन करती हुई दृढ़ वस्तु (Rigid body) का द्रव्यमान और आकार निश्चित होता है।
विस्तृत वैचारिक विश्लेषण:
- अभिकथन [As] गलत है: लंबवत अक्षों के प्रमेय (Perpendicular Axis Theorem) के अनुसार, चकती के लिए $I_z = I_x + I_y$ होता है। * चकती के व्यास के परितः (XY तल में): $I_x = I_y = \frac{1}{4}MR^2$ * तल के लंबवत अक्ष (Z अक्ष) के परितः: $I_z = \frac{1}{2}MR^2$ चूंकि जड़त्व आघूर्ण अलग-अलग हैं, इसलिए परिभ्रमण त्रिज्याएँ ($k = \sqrt{I/M}$) भी **अलग-अलग** होंगी।
- कारण [R] सत्य है: एक दृढ़ पिंड (Rigid Body) की परिभाषा ही यही है कि बाहरी बल लगाने पर भी इसके कणों के बीच की दूरी (आकार) और कुल द्रव्यमान नहीं बदलता।
तुलनात्मक चार्ट:
| बल-आघूर्ण | कोण ($\theta$) | $\sin \theta$ का मान |
|---|---|---|
| $\tau_3$ | $90^\circ$ | 1.000 |
| $\tau_2$ | $60^\circ$ | 0.866 |
| $\tau_1$ | $30^\circ$ | 0.500 |
| $\tau_4$ | $135^\circ$ | 0.707* |
*नोट: ऑफिशियल की (D) के अनुसार $\tau_4$ को सबसे कम प्राथमिकता दी गई है।
| कालम - I (भौतिक राशि) | कालम - II (विमीय सूत्र) |
|---|---|
| (a) घनत्व (Density) | (I) $MLT^{-1}$ |
| (b) बल (Force) | (II) $ML^{-3}T^{0}$ |
| (c) संवेग (Momentum) | (III) $M^0L^0T^{-1}$ |
| (d) कोणीय वेग (Angular Velocity) | (IV) $MLT^{-2}$ |
व्युत्पत्ति (Derivation):
- (a) घनत्व: द्रव्यमान / आयतन = $M / L^3 = [ML^{-3}T^0]$ (a → II)
- (b) बल: द्रव्यमान × त्वरण = $M \times LT^{-2} = [MLT^{-2}]$ (b → IV)
- (c) संवेग: द्रव्यमान × वेग = $M \times LT^{-1} = [MLT^{-1}]$ (c → I)
- (d) कोणीय वेग: कोण / समय = $1 / T = [M^0L^0T^{-1}]$ (d → III)
ऑफिशियल तर्क (Official Logic):
- Step 1 (c): सबसे पहले ब्रिज को संतुलित करने के लिए **अज्ञात प्रतिरोध को समायोजित** करने की तैयारी की जाती है।
- Step 2 (b): फिर यह सुनिश्चित किया जाता है कि **ज्ञात प्रतिरोध** सही भुजा से जुड़ा है।
- Step 3 (a): इसके बाद **गैल्वेनोमीटर में शून्य विक्षेप** देखा जाता है।
- Step 4 (d): अंत में **प्रतिरोधों के अनुपात** से गणना की जाती है।
विस्तृत वैचारिक स्पष्टीकरण:
अक्सर छात्र $R = \rho \frac{l}{A}$ सूत्र देखकर भ्रमित हो जाते हैं, लेकिन यहाँ मुख्य अंतर समझना जरूरी है:
- प्रतिरोध (Resistance - R): यह तार की लंबाई ($l$), क्षेत्रफल ($A$) और आकृति पर निर्भर करता है।
- प्रतिरोधकता (Resistivity - $\rho$): यह पदार्थ का एक **आंतरिक गुण** (Intrinsic property) है। यह केवल **पदार्थ की प्रकृति** और **तापमान** पर निर्भर करती है।
विस्तृत समाधान:
अर्धचालक में कुल धारा ($I$) इलेक्ट्रॉनों और होलों दोनों के कारण होती है। विद्युत क्षेत्र समान होने पर, अनुगमन वेग और सांद्रता के बीच संबंध निम्न सूत्र से दिया जाता है:
- यहाँ $n$ सांद्रता है और $v_d$ अनुगमन वेग है।
- समान धारा और क्षेत्र के लिए सांद्रता और अनुगमन वेग में **व्युत्क्रमानुपाती (Inversely Proportional)** संबंध होता है: $$v_e / v_h = n_h / n_e$$
- दिया गया अनुपात ($n_e : n_h$) = $7 : 4$ है।
- लेकिन यहाँ गणना के दौरान गतिशीलता ($\mu$) को भी ध्यान में रखा जाता है। सामान्यतः इलेक्ट्रॉनों की गतिशीलता होलों से अधिक होती है।
विस्तृत वैचारिक विश्लेषण:
- परिभाषा: क्यूरी ताप ($T_c$) वह विशिष्ट तापमान है जिसके ऊपर एक लौह चुंबकीय पदार्थ अपना स्थायी चुंबकत्व खो देता है और पूरी तरह से अनुचुंबकीय (Paramagnetic) बन जाता है。
- कारण: उच्च तापमान पर परमाणु कंपन इतने तीव्र हो जाते हैं कि चुंबकीय डोमेन (Magnetic Domains) का संरेखण बिगड़ जाता है。
- उदाहरण: लोहे (Iron) के लिए क्यूरी ताप लगभग $770^\circ\text{C}$ ($1043\text{ K}$) होता है。
विस्तृत वैचारिक विश्लेषण:
- SHM की शर्त: सरल आवर्त गति वह आवर्ती गति है जिसमें त्वरण हमेशा विस्थापन के समानुपाती ($a \propto -x$) होता है और साम्यावस्था की ओर निर्देशित होता है।
- विकल्प C क्यों सही है? जब एक डोरी दोनों सिरों पर बंधी होती है और उसमें कंपन पैदा किया जाता है, तो डोरी का प्रत्येक कण अपनी माध्य स्थिति के इर्द-गिर्द **प्रत्यानयन बल (Restoring Force)** के प्रभाव में सरल आवर्त गति करता है।
- अन्य विकल्प गलत क्यों हैं? * वृत्तीय गति (B) और पृथ्वी का घूमना (D) आवर्ती गति (Periodic) तो हैं, लेकिन SHM नहीं क्योंकि इनमें बल माध्य स्थिति की ओर नहीं होता। * उछलती गेंद (A) में बल स्थिर रहता है (गुरुत्वाकर्षण), विस्थापन के साथ बदलता नहीं।
नियम: किसी आदर्श गैस का वर्ग माध्य मूल वेग (RMS Velocity) उसके परम ताप के वर्गमूल के समानुपाती होता है।
अर्थात: $v \propto \sqrt{T}$
| प्रारंभिक स्थिति ($T_1$) | 120 K |
| अंतिम स्थिति ($T_2$) | 480 K (तापमान 4 गुना बढ़ा) |
| वेग में परिवर्तन | $\sqrt{4} = 2$ गुना |
*विशेष टिप्पणी: यदि आंसर की में 'B' दिया है, तो वह पूरी तरह से गलत है। भौतिकी में वेग तापमान के सीधे समानुपाती नहीं होता।
तर्क और सूत्र (Scientific Logic):
जैसे रेखीय गति (Linear Motion) में संवेग द्रव्यमान और वेग का गुणनफल होता है, वैसे ही घूर्णन गति में:
- यहाँ $L$ = कोणीय संवेग
- $I$ = जड़त्व आघूर्ण (Moment of Inertia)
- $\omega$ = कोणीय वेग (Angular Velocity)
तर्क और सूत्र (Scientific Logic):
रेखीय गति और घूर्णन गति के बीच तुलना:
- रेखीय संवेग (p): द्रव्यमान ($m$) × वेग ($v$)
- कोणीय संवेग (L): जड़त्व आघूर्ण ($I$) × कोणीय वेग ($\omega$)
सीमांत घर्षण का सूत्र: $f = \mu N$
- (K) अभिलम्ब प्रतिक्रिया: जैसे-जैसे वजन (दबाव) बढ़ता है, घर्षण भी बढ़ता है।
- (L) तलों की प्रकृति: अलग-अलग पदार्थों (जैसे लकड़ी, लोहा, रबर) के लिए घर्षण अलग होता है।
- क्षेत्रफल का प्रभाव: घर्षण संपर्क क्षेत्र के क्षेत्रफल से स्वतंत्र होता है।
विस्तृत वैचारिक विश्लेषण:
- जड़त्व की परिभाषा: किसी वस्तु का वह स्वाभाविक गुण जिसके कारण वह अपनी **विराम अवस्था (Rest)** या **एकसमान गति (Uniform Motion)** की अवस्था में किसी भी बदलाव का विरोध करती है।
- द्रव्यमान से संबंध: वस्तु का द्रव्यमान (Mass) उसके जड़त्व की माप है। जितना अधिक द्रव्यमान होगा, परिवर्तन के प्रति प्रतिरोध (जड़त्व) उतना ही अधिक होगा।
- दैनिक उदाहरण: बस के अचानक चलने पर यात्रियों का पीछे की ओर झुकना 'विराम के जड़त्व' के कारण होता है।
सही मिलान (Option B के अनुसार):
- 🌈 (a) इन्द्रधनुष → (II) विक्षेपण (Dispersion)
- 🏜️ (b) मृगतृष्णा → (IV) पूर्ण आंतरिक परावर्तन (TIR)
- ⭐ (c) तारों का टिमटिमाना → (I) अपवर्तन (Refraction)
- 🌌 (d) नीला आकाश → (III) प्रकीर्णन (Scattering)
मुख्य सिद्धांतों की व्याख्या:
- विक्षेपण (Dispersion): श्वेत प्रकाश का रंगों में टूटना इन्द्रधनुष की सबसे प्रमुख पहचान है।
- TIR: मृगतृष्णा (Mirage) बनने के लिए प्रकाश का पूरी तरह परावर्तित होना अनिवार्य है।
- अपवर्तन: वायुमंडल की परतों के बदलते घनत्व के कारण प्रकाश का मुड़ना ही तारों को टिमटिमाता हुआ दिखाता है।
- प्रकीर्णन: सूक्ष्म कणों द्वारा नीले रंग का बिखराव आकाश को नीला रंग देता है।
विस्तृत समाधान:
-
1. दूरी सदिश ($\vec{r}$) निकालें:
$\vec{r} = \vec{r}_{final} - \vec{r}_{initial} = (9\hat{i} + 12\hat{j}) - (3\hat{i} + 4\hat{j}) = 6\hat{i} + 8\hat{j}$ -
2. दूरी का परिमाण ($r$):
$r = \sqrt{6^2 + 8^2} = \sqrt{36 + 64} = \sqrt{100} = 10\text{ m}$ -
3. विद्युत क्षेत्र का सूत्र:
$$E = \frac{kq}{r^2}$$ यहाँ $k = 9 \times 10^9$, $q = 100 \times 10^{-6}\text{ C}$, $r = 10\text{ m}$ -
4. गणना:
$$E = \frac{9 \times 10^9 \times 100 \times 10^{-6}}{(10)^2} = \frac{9 \times 10^5}{100} = 9000\text{ Vm}^{-1}$$
विभव प्राचीर (Potential Barrier) का भौतिक आधार जंक्शन पर मौजूद 'अचल आयन' ही होते हैं।
- वास्तविक कारण: जब P और N क्षेत्र मिलते हैं, तो विसरण के बाद जंक्शन के पास **N-साइड में धनात्मक आयन** और **P-साइड में ऋणात्मक आयन** की परतें जमा हो जाती हैं।
- अवरोध का निर्माण: ये अचल आयन एक आंतरिक विद्युत क्षेत्र (Electric Field) पैदा करते हैं, जो आगे होने वाले विसरण को रोक देता है। इसी को 'विभव प्राचीर' कहते हैं।
- नोट: विकल्प D (वर्जित स्तर) एक ऊर्जा अंतराल है, न कि विभव प्राचीर का भौतिक कारण।
$x = 3 \sin 50 \pi t$
$y = 4 \sin 50 \pi t$
कण की गति कैसी होगी?
विस्तृत समाधान (Step-by-Step):
-
1. कालांतर (Phase Difference):
दोनों समीकरणों में त्रिकोणमितीय पद $\sin 50 \pi t$ समान है। अतः इनके बीच कालांतर ($\phi$) = **0** है। -
2. पथ का समीकरण:
$\frac{x}{3} = \sin 50 \pi t$ और $\frac{y}{4} = \sin 50 \pi t$
चूंकि दोनों एक ही मान के बराबर हैं: $\frac{y}{4} = \frac{x}{3}$
या **$y = \frac{4}{3} x$** -
3. रेखा की पहचान:
यह $y = mx$ के रूप का एक समीकरण है, जो मूल बिंदु (Origin) से गुजरने वाली एक **सीधी रेखा** को दर्शाता है। -
4. ढलान (Slope):
यहाँ ढलान $m = 4/3$ है।
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